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भीतर की बसंत

SUNIL NAYI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आजकल लगता है
        
                                                    
                            
बसंत ने भीतर एक मौसम
बो दिया है।

तितलियाँ हल्के से
अपने नन्हें पंख से
रंग बिखेर रही हैं।

रात जब
अपनी कलियाँ
समेटता है,

भीतर की झील में
एक बुलबुला सतह से
टकराता है,

फिर—
कुछ देर बाद
एक हल्की सी हलचल…

जैसे घास की
उँगलियों ने ज़मीन को
गुदगुदी की हो।

कभी हल्की लहर पर
हथेली रख कर
धड़कन सहलाती हूँ।

दिन ब दिन भीतर
कमल धीरे-धीरे
एक सूरज जमा कर रहा है।

झील की तह में
नन्ही लहर कुछ—
गुनगुना रही है,

जैसे चाँद ने
बूंदों से खेलने की
ज़िद की है।

और कभी लगता है
वह अभी पुकारेगा—
माँ…..
3 महीने पहले
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