विज्ञापन

गाँव और जीवन

SUJAL NAUTIYAL

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज मैं थोड़ा उदास हूँ,
        
                                                    
                            
उदासी मुझे मेरे गाँव की है,
मेरे पहाड़, मेरे घर और मेरे लोगों की है।
हाँ, आज मैं थोड़ा उदास हूँ।

घर से दूर, सब छोड़कर शहर आया हूँ,
एक किराए के कमरे में अक्सर उदास रहता हूँ।
कुछ किताबें हैं, बड़ा अफ़सर बनना चाहता हूँ,
गाँव के उस घर को उसके हाल पर छोड़ आया हूँ।

ये वक़्त बहुत तेज़ गुज़र रहा है,
मेरी मेहनत पर सवाल उठा रहा है,
छूटते जा रहे हैं लोग मेरे,
और ये वक़्त मुझे मेरे घर से दूर कर रहा है।

किसी दिन मैं अधिकारी बन जाऊँगा,
कुछ पैसे कमा कर वापस गाँव लौट जाऊँगा।
तब मेरी उम्र साठ की होगी शायद,
मगर सबको खोया हुआ पाकर,
वापस शहर लौट जाऊँगा।

मुझे मेरे गाँव में बिताया वो हर पल याद आता है,
हँसते-खेलते बच्चे, तंबाकू पीते वो बूढ़े लोग—
सब याद आता है।
शहर में एक घर है और अब मेरी उम्र भी ज़्यादा हो गई है,
मगर कैसे बताऊँ मैं तुम सबको,
कि मुझे मेरा गाँव कितना याद आता है।
4 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

RATAN KUMAR

637 कविताएं

View Profile

Anil Pandey

416 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10393 कविताएं

View Profile