विज्ञापन

इंसानियत की जरूरत

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुझे दुनिया वालों की जरूरत बहुत है,
        
                                                    
                            
मगर बनके इंसान न देखा उन्हें है।
जब भी हमें उनकी जरूरत पड़ी है,
बड़े प्यार से हमने बुलाया उन्हें है।

मगर दिल में नफरत भी पलती रही है,
कहीं मन की पीड़ा भी ढलती रही है।
हँसी होंठ पर थी, मगर दर्द भीतर,
हमने न जाने छुपाया बहुत है।

हमें प्यार , इंसानियत की जरूरत,
हमें एक-दूजे की चाहत की जरूरत।
मगर पूर्वजों से न ये सीख पाई,
कि इंसानियत से बड़ी चीज क्या है।

अगर बनके इंसान रहेंगे सभी हम,
तो आपस में मिलकर चलेंगे सभी हम।
न कोई बड़ा हो, न कोई हो छोटा,
सभी को बराबर समझेंगे सभी हम।

नफरत घटेगी, मोहब्बत बढ़ेगी,
दिलों में नई एक चाहत जगेगी।
खुशियाँ मिलेंगी, खुशी बाँटेंगे हम,
गले से लगाकर मिलेंगे सभी हम।

बढ़ेगी उम्र, रक्त रगों में बढ़ेगा,
मगर दिल में इंसानियत भी बढ़ेगी।
नफरत की दीवार ढहती रहेगी,
मोहब्बत की दुनिया सँवरती रहेगी।

न मंदिर से पूछें, न मस्जिद से पूछें,
न जाति, न मजहब की बातें ही पूछें।
बस इतना ही पूछें—क्या इंसान हो तुम?
अगर हाँ, तो फिर प्यार करना भी सीखो।

जो गिरता मिले, उसको थामें सभी हम,
जो भूखा मिले, उसको खिलाएँ सभी हम।
किसी की आँखों में आँसू न रहने दें,
दुखी दिल को हँसना सिखाएँ सभी हम।

यही जिंदगी है, यही धर्म अपना,
यही कर्म अपना, यही मर्म अपना।
अगर बनके इंसान जीना है हमको,
तो इंसानियत को जगाएँ सभी हम।

नफरत घटेगी, मोहब्बत बढ़ेगी,
दिलों में नई एक दुनिया बसेगी।
अगर बनके इंसान रहेंगे सभी हम,
तो धरती को भी स्वर्ग-सी पाएंगे हम।
-सूबा लाल "अंजाना"
6 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Dasani

15 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12768 कविताएं

View Profile

Shivendra Mishra

4 कविताएं

View Profile