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इंसानियत की भीड़

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बड़ी भीड़ यारों शहर में था देखा,
        
                                                    
                            
न कोई किसी को था जाना न देखा।
बस अपनी ही धुन में अपनों के खातिर,
बे परवाह होकर चले जा रहे थे।

कड़ी धूप हो या हो बारिस कि बूँदें,
बिना दाना पानी बस अपनों के हित में।
उन्हें अपनी चिंता न कोई फिकर थी,
न लाठी,न डंडे न आंसू गोले की डर थी।

फटे सिर तो उनको नहीं कोई ग़म है,
टूटे हड्डी, पसली तो भी वो कम है।
भले मां से बच्चा बिछुड़ जाए तो क्या,
भले जेल बंदों से भर जाए तो क्या।

मगर साथ इंसानियत की रहेगी,
कहते एक से बड़े एक जो भक्त भारत।
सदा से है आगे जो सच्चे रहे थे।
करुणा, दया, प्रेम ले जो चले थे।

उठो, क्योंकि मौन भी अपराध बन जाता है,
जब अत्याचार सामने खड़ा मुस्काता है।
इंसान वही, जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो,
यही मानवता का सबसे ऊँचा नाता है।
-सूबा लाल "अंजाना"
3 महीने पहले
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