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देश की आजादी

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देश की आज़ादी में जिन्होंने सब कुछ न्योछावर किया,
        
                                                    
                            
देशहित में सोचकर ही हर बीज को बोया किया।
सोचा था देश कभी ऐसे हालात से न गुज़रेगा,
न्याय पाने को इंसान अपने ही देश में न तरसेगा।

“हम होंगे आज़ाद” की उम्मीदें मन में जगाई थीं,
देश सुधारने की उन्होंने कसमें भी खाई थीं।
आज तिरंगा ऊँचा है, फिर भी मन क्यों भयभीत है?
गरीब, बहन-बेटियाँ और ईमानदार क्यों त्रस्त हैं?

कैसी आज़ादी है जहाँ शिक्षा सबका अधिकार नहीं,
गरीब के साथ समता और सम्मान का व्यवहार नहीं।
संविधान क्या बस कागज़ों तक ही सीमित रह गया है?
क्या कानून केवल निर्बल को दंड देने का जरिया है?

वीरों ने हँसकर अपने प्राण देश पर न्योछावर किए,
हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी के सपने दिए।
पर आज कहीं भूख है, कहीं बेरोज़गारी का साया है,
भ्रष्टाचार और बेबसी ने हर ओर डेरा जमाया है।

अपना देश, अपना शासन, अपना कानून तो बना लिया,
पर न्याय के मंदिर में भी गरीब क्यों घबरा गया?
सच बोलने वाला अक्सर अकेला रह जाता है,
और झूठ का सौदागर सम्मान से मुस्कुराता है।

हे वीरों! क्या यही भारत तुम्हारा सपना था?
क्या हमने सच में तुम्हारा सपना अपना माना था?

आज फिर उसी संकल्प की ज़रूरत दोहरानी है,
न्याय, समता और सत्य की राह अपनानी है।
आज़ादी केवल पर्व नहीं, यह जिम्मेदारी भी है,
हर नागरिक के अधिकारों की पहरेदारी भी है।

जब तक भूख और अन्याय है, आज़ादी अधूरी है,
मानवता और सम्मान से ही सच्ची खुशहाली पूरी है।
जिस दिन हर घर में रोटी, रोजगार और सम्मान होगा,
उस दिन सच में मेरा भारत आज़ाद महान होगा।
-सूबा लाल "अंजाना"
2 महीने पहले
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