विज्ञापन

जब तक फल था, छाँव थी मेरी, सबने अपना माना

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पुराना पेड़ आखिर कब तक, यूँ ही खड़ा रहेगा,
        
                                                    
                            
अब तो इसकी शाखाएँ भी, टूटती जा रही हैं।
पत्ते भी साथ देना छोड़कर, झड़ते जा रहे हैं,
नई-नई कोपलें भी आने से, कतरा रही हैं।

बहुत परोपकार किया मैंने, लोगों ने मुझ पर जिया,
मेरी घनी छाँव में बैठकर, जीवन सुख से जिया।
अब छाया कम हुई तो मुझसे, लोग किनारा कर रहे हैं,
फूल-कलियाँ भी पोषण बिन, आने से मना कर रही हैं।

अपने जैसे न जाने कितने, बीज मैंने बो दिए,
सींच-सींचकर जीवन देकर, कितने वृक्ष खड़े किए।
अब उन्हें अपने ही जीवन से, फुर्सत कहाँ मिलती है,
मुझसे कुछ मिलता नहीं, इसलिए दूरी बढ़ती है।

जब तक फल था, छाँव थी मेरी, सबने अपना माना,
सुख के दिन थे तब हर कोई, मेरा था दीवाना।
अब सूनी डालों को देखकर, पराये भी मुड़ जाते हैं,
जिस वृक्ष ने सबको पाला, उसको ही भूल जाते हैं।

फिर भी वृक्ष शिकायत करके, अपना धर्म न छोड़ेगा,
सूखी धरती में भी शायद, कोई बीज उगेगा।
जीवन भर जो देता आया, देना उसका काम रहेगा,
गिरकर भी यह पुराना पेड़, नई पीढ़ी को नाम देगा।
-सूबा लाल "अंजाना"
3 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Şhahnawaz Pahat

39 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13403 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

11075 कविताएं

View Profile

Rajesh Kumar Sen Raj

4 कविताएं

View Profile