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अब मुझे डराता है, वक्त का गुजरना भी

Somesh Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब मुझे डराता है, वक्त का गुजरना भी,
        
                                                    
                            
शाख से जुदा होकर,फूल का बिखरना भी.

बंद हो दरीचा तो, धूप भी नहीं दिखती,
और रात होते ही, चाँद का निकलना भी.

सख्त दिल कई देखे, बर्फ की तरह ठंडे,
इश्क़ की तपिश पाकर,बर्फ का पिघलना भी.

उसके रुख पे बारिश का,नाचते हुए गिरना,
और भीग कर उसके, रूप का निखरना भी.

दोस्ती भी देख चुके, बेरुखी भी देख चुके,
और इक दिन अपने ,यार का बिछड़ना भी.

मैकदे में साकी को, देखकर बहक उठना,
और ठोकरें खा कर, रिन्द का संभलना भी.
-सोमेश शर्मा
 
3 दिन पहले
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