हर जगह महंगाई का दौर है,
बस टैक्स टैक्स मतलब का शोर है,
अपना धन भी अपना नही लग रहा,
नज़र लगा रहा उस पर भी कोई और है।
पहले प्यार से दाने डाले जा रहे थे,
हम भी वाह वाह किये जा रहे थे,
जब पंजे जकड़ गए हमारे,
पंख हमारे ही काटे जा रहे थे।
सोचा न था कोई इतना बेवफा हो जाएगा,
विश्वास में लेकर कैद कर ले जाएगा,
आदमी मजबूर हो ऐसा बंधा जंजीरो से,
कैसे अब इस कैद से निकल पायेगा।