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मित्रता का अर्थ

Shreya Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मित्र वही, जो साथ चले जब राहों में अँधियारा हो,
        
                                                    
                            
मित्र वही, जो दीप बने जब मन भीतर से हारा हो।

मित्र न केवल हँसी बाँटे, आँसू भी अपनाता है,
गिरते हुए विश्वासों को, हँसकर फिर उठाता है।
मतलब से जो साथ निभाए, वह तो बस व्यवहार है,
बिन स्वार्थ जो हाथ थाम ले, वही सच्चा यार है।

कृष्ण-सुदामा ने जग को, मित्रता का मान दिया,
राजमहल में बैठ के भी, प्रेम को सम्मान दिया।
ना धन देखा, ना ऊँच-नीच, ना वैभव का श्रृंगार,
एक मुट्ठी चावल में पाया, प्रेम का सारा संसार।

राम मिले जब सुग्रीव से, दुख ने हाथ मिलाया था,
मित्र बनाकर राम ने उसका, खोया मान दिलाया था।
मित्र वही जो न्याय की खातिर, अपना वचन निभाता है,अपने सुख से पहले, मित्र का दुख मिटाता है।

हनुमान ने राम को माना, प्राणों से भी प्यारा था,
सेवा में ही मित्रधर्म का, सबसे उजला तारा था।
मित्र वही, जो साथ खड़ा हो, चाहे कैसी घड़ी आए,
अपना सब कुछ देकर भी, मित्र का मान बचाए।

दोस्ती केवल शब्द नहीं, जीवन का विश्वास है,
रिश्तों की सूखी धरती पर, सावन की मधुमास है।
जज़्बातों का मान जहाँ हो, सच का हो सत्कार,
वहीं जन्म लेती है जग में, सच्ची मित्रता हर बार।

आज अगर मित्र बनना है, पहले मन को साफ़ करो,
ईर्ष्या, छल और झूठ छोड़कर, प्रेम का दीपक आप धरो।क्योंकि भगवान भी उसी हृदय में, मित्र बनकर आते हैं,जहाँ प्रेम निस्वार्थ बहता है, वहीं सुदामा मुस्काते हैं।

मित्र वही, जो कृष्ण-सा हो, प्रेम जिसे अभिमान न हो,
मित्र वही, जो राम-सा हो, जिसका कोई स्वार्थ न हो।
ऐसी मित्रता मिले सभी को, यही रहे उपहार-मित्र नहीं, ईश्वर का रूप है, सच्चा हर इक यार।
2 महीने पहले
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