वंदन है उस ज्ञान-सागर का,
वंदन बुद्धि-विस्तार का।
प्रथम पूज्य गणराय हमारे,
दीप बने हर विचार का।।
जहाँ विवेक की ज्योति जले,वहाँ विघ्न कभी टिक न सके।
श्रीगणेश का स्मरण जो कर ले,उसके पथ में फूल खिलें।।
छोटी आँखें, गहरी दृष्टि,
हर रहस्य को जानें।
बड़े कान से सीख यही-
सबकी बातें मानें।।
सूंड सिखाए लचीलापन,
हर परिस्थिति में ढलना।
ज्ञान तभी पूर्ण कहलाए,
जब आए सबको संभालना।।
मूषक वाहन कहता हमसे-
अहंकार को छोटा रखना।
मन की हर चंचल इच्छा पर,
संयम का दीपक रखना।।
हे विघ्नहर्ता, बुद्धि-दाता,
ज्ञान सुधा बरसाओ।
अज्ञान के तम को हरकर,
सत्य का पथ दिखलाओ।।
कलम हमारी सत्य लिखे,
मन में सद्विचार रहे।
श्रीगणेश की कृपा से जीवन,
ज्ञान, विनय और प्रेम से भरे।।