कुछ तो रक्खा होगा ही महबूब की आँख के पानी में
डूब नहीं जाते तो हम क्या करते भरी जवानी में
पहले वस्ल की दिलकश रातें और फिर हिज्र की सौग़ातें
तुम क्या जानो तुम ने क्या क्या खोया है नादानी में
सागर जैसा ग्राही रहना और नदिया जैसा बहना
वरना अक्सर कीड़े पड़ जाते हैं ठहरे पानी में
आज उम्मीद वफ़ा की करना वो भी ऐसी दुनिया से
बिलकुल वैसा, जैसे कोई पानी लिख दे पानी में
कोई मंथरा कोई कैकेयी कोई रावण है इसमें
क्यों कोई भी राम नहीं है मेरी राम कहानी में
ज़िक़्र तुम्हारा आये जिस में शेर वही हो सकता है
वरना क्या रक्खा ऊला में क्या रक्खा है सानी में
- शिवम् शर्मा गुमनाम