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आर्यावर्तवासी

Shatyagashi -The

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहाँ गयी वो संस्कृति? कहाँ गया वो सद्-आचार?
        
                                                    
                            
ऋषियों की भारत भूमि पर, हर आदमी है अब लाचार।।

सत्यम - शिवम - सुन्दरम ही जहाँ, जीवन का आधार रहा।
पर देख आज आर्यावर्त की हालत, राम-रहीम धिक्कार रहा।।

जिधर देखो उधर गंध , भुखमरी, फैला भ्रष्ट, व्यभिचार।
कायर, अवसरवादी हो गएं, मानव, मानव से है शर्मसार।।

पुरुष का पौरुष खो गया, गया आँखों का पानी।
हर यौवन मन बुढ़ा होकर, कर रहा है मनमानी।।

जगत गुरु का गौरव लिए, भारत की भीत रही।
पर पश्चिम की पाश्चात्य सभ्यता, अब हम सबको सींच रही।।

बगिया का हर फूल, अब अनजाना सा लगता है।
अपने घर के बच्चें ही, पर जना सा लगता है।।

नहीं उनमें संस्कार हमारा, नहीं कोई आचार।
भटक गयी हैं युवा पीढ़ी, कर रही हैं दुष्प्रचार।।

अब तो लड़कियाँ भी बिगड़ गयीं, तब लड़को की क्या बात करें।
पर अभिभावक और माता-पिता भी, अपनी गलती स्वीकार करें।।

माता-पिता त्रिदेव तुल्य हैं, पर हम ब्रह्मा ही बन पाते हैं।
विष्णु और शिव के रूप को, अक्सर भष्म कर जाते हैं।।

तीनों के संयोग से ही, भारत भूमि का उत्थान होगा।
तब पुनः स्वदेश हमारा, जगत गुरु महान होगा।।

माता की गरिमा को तुम अब, जहाँ चाहो ले जाओ।
बेच दो इसे तुम, या, खुद से ही श्रृंगार कराओ।।
 
2 महीने पहले
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