मेरा बचपन मुझको लौटा दे
बेवजह की टेंशन को दूर भगा दे
फिर से वो गलियाँ, वो यार पुराने,
वो कागज़ की नावें, वो किस्से सुहाने।
वो छोटी-सी दुनिया फिर से सजा दे,
मेरा बचपन मुझको लौटा दे ।
न कल की फ़िक्र हो, न हो आज का ग़म,
खिलखिलाता रहे मेरा, बचपन हरदम।
पापा की डांट और मां का वो प्यार,
दादी नानी की कहानी से,सबको है प्यार।
वो मासूम सा बचपना फिर से ला दे,
मेरा बचपन मुझको लौटा दे।
न दौलत की चाह, न शोहरत का नशा,
बस मिट्टी की खुशबू और अपनों का मज़ा।
न पैसे की चिंता, न रिश्तों का था डर
छोटी-सी दुनिया में खुशियों का था घर ।
वो बेफ़िक्री के दिन फिर से बुला दे,
मेरा बचपन मुझको लौटा दे।
फिर से गली में पतंग उड़ाऊँ,
बारिश में भीगूँ, कीचड़ में सन जाऊं ।
कंचे, गुल्ली-डंडा, वो बच्चों की टोली,
बिन मतलब की हँसी थी और ठिठोली।
वो मिट्टी की खुशबू, वो बारिश दिखा दे,
मेरा बचपन मुझको लौटा दे।
जो वक़्त निकल गया, वो वापस न आए,
मगर उसकी थोड़ी-सी खुशबू तो दे जाए।
ना कल की चिंता, ना कल का हिसाब,
छोटी-सी खुशी और इतना-सा ख्वाब।
दो पल के लिए ही , वो दिन तो दिखा दे,
मेरा बचपन मुझको लौटा दे।
चेहरे पे हँसी हो मगर दिल है उदास,
भीड़ में भी होती है तन्हाई का एहसास ।
थका हूँ ज़िंदगी से, थोड़ा मुस्कुरा दे,
मेरा बचपन मुझको लौटा दे...
~शशि भूषण