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सुकून : दार्शनिक दोहावली

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मौन-दीप अंतस जले, मिटे विकल संताप।
        
                                                    
                            
सुकून मिले जिस मन को, जहाँ टले अभिशाप॥

तृष्णा की जब धूल सब, धो दे निर्मल प्रीति।
अंतर में तब खिल उठे, शाश्वत सुख की रीति॥

बाहर ढूँढ़े जग जिसे, भीतर उसका धाम।
स्वयं मिला जो आत्म से, मिला सुकून तमाम॥

क्षीण हों जब इच्छाएँ, मिट जाए अभिमान।
तब मुस्काता मौन ही, बन जीवन-वरदान॥
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
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