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भीतर आते फरिश्ते : प्रतीकात्मक आध्यात्मिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तम-कुहासों में दीप जलाते, मौन दिशाएँ भोर सजाते हैं।
        
                                                    
                            
टूटी वीणा के नीरव तार, कोमल स्पर्श जगाते हैं।

भीगी पलकों में करुणा बन, अश्रु-दीप मुस्काते हैं।
काँटों वाली सूनी राहों में, फूल खिला जाते हैं।

घृणा-दहन के तपते वन में, प्रेम-मेघ घिर आते हैं।
विष की पीड़ा हर लेते हैं, अमृत-स्वर दे जाते हैं।

पंख नहीं, पर नभ-स्पर्श लिए, रूप नहीं, पर छाया हैं।
पिता-दुलार, माँ की ममता, अनकहे स्पर्शों में मिलते हैं।

अहं-हिमालय गलता जाए, अंतर-सूरज जागे जब—
निज से निज का भेद मिटे, चेतन नभ मुस्काए तब।

गिरते को बाँह थमाएँ, रोते अधरों की हँसी बनें।
तम पीकर पथ दीपित करते, निशि में उषा-किरण बनें।

कर्म जहाँ निर्मल हो जाए, वहीं दिव्यता झरती है।
मानवता जब प्रेम बने, फरिश्ते भीतर आते हैं।

ईश्वर दूर गगन में नहीं, श्वासों में अनहद गाते हैं।
जहाँ सत्य की लौ जलती—वहीं फरिश्ते आते हैं।
-सनातन मुकुंद
3 सप्ताह पहले
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