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अनाम अनुगूँज : दार्शनिक प्रतीक काव्य

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किस अनादि सिंधु-स्मृति की, बूँद शिला पर ठहर गई?
        
                                                    
                            
किस अनाहत ज्वार-लिपि की, रेखा रेत में उतर गई?

स्रोत न जाने किस दिशा से, धार न पूछे पंथ कहाँ;
लहर स्वयं से अनभिज्ञ, सागर जाने अंत कहाँ।

शंख अनाहत स्वर सँजोए, सीपी मौन उजास धरे,
अदृश्य चन्द्रिका की आभा, मोती बन अंतर में झरे।

नील गगन की दूर निसीमाएँ, जल में होकर खोती रहीं,
अतल निःशब्द गहराइयाँ, तरंगों में अर्थ पिरोती रहीं।

तट ने केवल रूप सँवारा, गति का कोई तट न हुआ,
बहना ही जब धर्म ठहरा, किसका मिलना, क्या बिछुड़ा?

डूब न पाया कभी क्षितिज भी, फिर प्रतिबिंब उतरता है,
जो अदृश्य की देह धरे, वह निस्तब्धता में झरता है।

जब अंतिम कंपन भी थमता, ज्वार न कोई, भँवर न शेष—
तब जल अपनी मौन गहराई, ओढ़े निःसीमता का वेश।
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
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