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जिसने चलना सिखाया, उसी को छोड़कर जाता हूँ।

Shakeel Jay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ग़ज़ल — माँ का साया
        
                                                    
                            

माँ के होने से घर में रौनक है,
माँ न हो तो घर में सन्नाटा है।

सोचता हूँ वो न रहेगी तब क्या होगा,
बस अब इसी बात से दिल घबराता है।

जिसकी उँगली पकड़कर चलना सीखा,
आज उसी को सहारे की ज़रूरत बताता है।

मेरी ख़ातिर जिसने उम्र गुज़ारी अपनी,
उसका चेहरा अब मुझे बहुत डराता है।

जिसकी दुआओं से मुश्किलें टलती रहीं,
उसका झुर्रियों भरा चेहरा बहुत कुछ बताता है।

मैं तो दुनिया की दौलत कमाने में लगा हूँ,
माँ का हर गुज़रता लम्हा मुझे समझाता है।

मेरी ख़ुशियों के लिए जिसने ग़म छुपाए,
उसकी आँखों का दर्द मुझे रुलाता है।

कभी सोचूँ कि काश वक़्त ठहर जाए,
माँ के बूढ़े होते चेहरे से दिल घबराता है।

उसके हाथों की रोटी में जो स्वाद मिलता है,
वो स्वाद दुनिया का कोई पकवान न दे पाता है।

जब भी घर लौटूँ, माँ दरवाज़े पर मिले,
बस यही ख़्वाब मेरी आँखों में समाता है।

कितना नादान हूँ मैं, ये सोचकर रोता हूँ,
जिसने चलना सिखाया, उसी को छोड़कर जाता हूँ।

ऐ ख़ुदा, मेरी उम्र भी माँ के नाम कर दे,
उसके बिना जीने का ख़याल ही रुलाता है।

माँ की ख़िदमत से बढ़कर इबादत क्या होगी,
ये ख़याल हर बार मेरे दिल में आता है।

समीर प्यासा की बस इतनी-सी दुआ है,
माँ का साया रहे, यही दिल चाहता है।
4 दिन पहले
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