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कविता (जिंदगी से नाराज़)

Savitri Swami

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जो कल नहीं थी ऐसी,
        
                                                    
                            
जैसी आज हूं मैं।
क्यों बिना वजह,
जिंदगी से नाराज हूं मैं।।
जब धड़कता है दिल,
सांसे रुक सी जाती है।
देख अपनी ही तस्वीर,
निगाहें झुक सी जाती है।।
कोई समझ सके ना भाव,
ऐसा अंदाज हूं मैं।
क्यों बिना वजह,
जिंदगी से नाराज हूं मैं।।
ऊंचे है सपने मेरे,
क्या उड़ान कोई दे सकेगा।
देकर अपनी खुशी,
क्या गम कोई ले सकेगा।।
पंख नहीं फिर भी,
एक परवाज हूं मैं।
क्यों बिना वजह,
जिंदगी से नाराज हूं मैं।।
जो शब्दों में व्यक्त हो,
ऐसे मेरे भाव नहीं।
जो देख सके दृग दृष्टि,
ऐसे मेरे घाव नहीं।।
लफ्जों पे शब्द नहीं,
फिर भी एक अल्फाज हूं मैं।
क्यों बिना वजह,
जिंदगी से नाराज हूं मैं।।
न पाने की चाहत मेरी,
ना खोने से डरती हूं।
आखरी मंजिल मौत मेरी,
हर पल जिया करती हूं।।
खुली किताब है जिंदगी,
फिर भी एक राज हूं मैं।
क्यों बिना वजह,
जिंदगी से नाराज हूं मैं।।
जो कल नहीं थी ऐसी,
जैसी आज हूं मैं।
क्यों बिना वजह,
जिंदगी से नाराज हूं मैं।।
 
एक महीने पहले
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