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ज़रूरत से परे रिश्ते

Saurabh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़रूरत के हिसाब से
        
                                                    
                            
लोगों से जुड़े रहना,
दुनिया की एक
सामान्य सी रवायत है।

काम हो तो याद करना,
काम निकले तो पास आना,
और मतलब पूरा होते ही
धीरे-धीरे दूर हो जाना—
शायद यही आज
रिश्तों की हकीकत बन गई है।

लेकिन...

जब कोई जरूरत न हो,
फिर भी किसी का हाल पूछना,
बिना किसी स्वार्थ के
किसी की खुशी में मुस्कुराना,
किसी के दर्द को
बिना कहे समझ जाना...

यही तो इंसानियत है,
यही रिश्तों की खूबसूरती है।

जो हाथ
जरूरत में ही नहीं,
बल्कि बेवजह भी थामे जाएँ,
जो रिश्ते
मतलब से नहीं,
दिल से निभाए जाएँ—

वही रिश्ते
समय के साथ पुराने नहीं होते,
बल्कि और भी गहरे हो जाते हैं।

क्योंकि अच्छा व्यक्तित्व
इस बात से नहीं पहचाना जाता
कि हम कितने लोगों के काम आए,

बल्कि इससे पहचाना जाता है
कि बिना किसी काम के भी
हम कितने लोगों का ख्याल रखते हैं।

जरूरतें रिश्ते बना सकती हैं,
मगर निस्वार्थ परवाह ही
उन्हें जिंदगी भर निभाती है।
एक महीने पहले
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