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तीन पच्चीस की लोकल

Satish Borkar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पंद्रह बाई पंद्रह की डॉरमेट्री,
        
                                                    
                            
ठूँसे हुए हैं जहाँ बेड आठ।
ज़रा सा संभल कर न चले कोई,
तो गिर पड़ती है मच्छरदानी की रॉड।

जहाँ एक-एक करके रातों को,
लोगों का आना-जाना रहता है।
वहाँ रात के ठीक दो-पंद्रह पर,
अचानक फोन में अलार्म बजता है।

आधी-अधूरी नींद से,
तब अलसा के वह उठता है।
उस खामोश कमरे में,
औरों की नींद न टूटे;
इसलिए घोर अँधेरे में तैयार हो,
वह चुपचाप बैग उठा के चलता है।

झींगुर की ध्वनि सहचर है,
विश्राम-गृह से प्लेटफॉर्म एक तक।
जहाँ बारह कोच की सोती डेमू,
खड़ी है इस छोर से उस छोर तक।

अंतिम, मध्य और प्रारम्भ के,
तीनों इंजन को थपथपा कर,
डीजल व कूलेंट पिला कर,
तीनों में वह नव प्राण भरता है।
दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे, नीचे देख,
गाड़ी की रवानगी की तैयारी करता है।

हैं बस तीन कर्मचारी,
शुरू से अंत तक ट्रेन है खाली।
संकेत प्राप्त होते ही तिमिर में,
तीन पच्चीस की लोकल चल पड़ती है।
चार उदास और सजग आँखें,
हेडलाइट की रोशनी में रेल लाइन परखती हैं।

कोई न उतरता है, न चढ़ता है,
पर हर स्टेशन पर यह रुकती है।
अरण्य और अद्रि को भेदते,
पूर्व प्रभात की बेला में,
अपने गंतव्य को पहुँचती है।

दस मिनट के विश्राम के बाद,
उन्हीं थकी, जलती आँखों के साथ,
नए नाम व नंबर को अपना कर,
प्रत्यावर्तन की राह वह पकड़ती है।


 
2 महीने पहले
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