विज्ञापन

मधुशाला भाग दो

Sarvesh Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नशा जब उतरता है, तो आईना डराता है,
        
                                                    
                            
वजूद का शोर फिर, खामोशी में बदल जाता है।
ढलती उम्र का तकाजा, समझ नहीं आता है,
जरा देख मधुशाला बुलाता है।।

ख़्वाबों के महलों में, खुद को सजाता है,
हकीकत की धरातल से, दूर ले जाता है।
जो खो गया रूह में, वो लौट कहाँ आता है,
जरा देख मधुशाला बुलाता है।।

प्यासा था जो कभी, अब दरिया में डूब जाता है,
किनारे की कश्ती को, खुद ही जलाता है।
नशा-ए-मदिरा का यह सिलसिला, किसको समझ आता है,
जरा देख मधुशाला बुलाता है।।
-सर्वेश यादव
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Prasoon Saxena

972 कविताएं

View Profile