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पहचान कर्मो से हो

Sanjay Nirala

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहचान कर्मों से हो
        
                                                    
                            

पहन रिदा सरनेम का, देते जग को ज्ञान,
कभी नहीं जो दे सके, निज भ्राता का ध्यान।
गर्व लिए किस बात का, करते हैं अभिमान,
मानवता से क्या बड़ी, जाति-नाम की शान?

चाह रही कब राम को, अभिधा हो पहचान,
कृष्ण स्वयं में पूर्ण थे, कर्मों से सम्मान।
परिचय तो चाणक्य का, उनकी नीति महान,
अर्जुन को किस नाम से, जग में इतना मान?

नाम नहीं रे, कर्म से, मानव बने महान,
निर्धारित कब जन्म से, किसका क्या सम्मान।
दीवारें उपनाम की, क्यों बाँटें इंसान?
जाति-जाति के फेर में, क्यों बाँटते जहान?

अगर पहचान चाहिए, कर्मों पर दे ध्यान,
ऊँचा होना है अगर, मानवता को जान।
वंश नहीं, व्यवहार से, बने बड़ा इंसान,
पीछे रख सरनेम को, आगे हो पहचान।

जाति नहीं पहचान हो, कर्म बने आधार,
प्रेम, दया औ सत्य से, हो जीवन साकार।
मानवता हो भाल पर, हृदय रहे निष्काम,
यही निराला जाति रे, यही मनुज का नाम।
-संजय निराला
2 दिन पहले
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