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हँसी के पीछे छिपा हिसाब हमारा है!

Sandhya tiwari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मधुशाला का नज़ारा क्या खूब लगता है,
        
                                                    
                            
सुबह जो छिपा रहे, शाम को दिखता है।
दिन ढले तो महफ़िल का रंग निराला है,
हर गली में खुलती एक छोटी मधुशाला है!

इंसान को दीवाना बनाती ये बोतलें,
खुद तो नहीं नाचतीं, सबको नचाती ये बोतलें।
बूढ़ा घर का रस्ता गूगल से पूछकर आए,
बच्चा बोतल उठाए, खिलौने धूल में खाए।
जो न देखना चाहो, वही लाइव दिखाती ये बोतलें,
हँसते-हँसते घर की अर्थव्यवस्था डुबाती ये बोतलें!

चेहरे पर रौनक, आँखों में सुरूर,
पीकर निकलते हैं घर से बड़े हुज़ूर।
सड़क किनारे लेटकर बिस्तर मखमली बताते हैं,
खुले आसमान के नीचे महल सजाते हैं।
सपनों में महबूबा, हक़ीक़त में नाला है,
वाह रे नशे! तेरा खेल निराला है!

दुनिया चाहे जितना इनको बुरा कहे,
अपनी ही धुन में ये अपनी बात कहें।
अंग्रेज़ी में बोलें, खुद को वीआईपी समझें,
दो कदम में हाँफें, फिर दुनिया को नापें!
कुर्सी पर बैठे हों या सड़क के किनारे,
नशे में सब लगते हैं देश के रखवाले!

साहब हों, नेता हों या कोई अफ़सर,
बोतल का जादू चलता हर मंज़र।
कहते हैं बुज़ुर्ग, ज़रा नज़र बचाकर रखना,
नशे से नहीं, इसके बिल और अंजाम से डरना।
जो सच है, उसे पर्दा भी ढक नहीं पाता,
बोतल के आगे पद भी पैदल हो जाता!

होके टल्ली चाँद को धरती पर लाएँ,
अपने ही पड़ोसी का हाथ पकड़ घर जाएँ।
होश गुम, रास्ता गुम, मंज़िल का पता नहीं,
सुबह पूछो तो कहें—हम थे ही कहाँ, याद नहीं!

मधुशाला का नज़ारा क्या खूब लगता है,
हँसते चेहरों के पीछे दर्द भी पलता है।
बोतल की मस्ती में इतना न खो जाना,
घर भी है तुम्हारा—किराया भी भर जाना!
वाह! क्या खूब नज़ारा है,
हँसी के पीछे छिपा हिसाब हमारा है!
3 दिन पहले
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Ankit Kumar

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