जो होता है उपलब्ध सदा
उसको नहीं कोई गिनता है
उसका अपना व्यक्तित्व भी तब
बड़ी आसानी से छिनता है
हो जाता है सस्ता वह तब
हर किसी ऐरों-गैरों के लिए
हर नाचने वाले समझें उसे
घुँघरू अपने पैरों के लिए
दो मुंहीं रंगत से बना है जो
वह उसको शिक्षा देता है
खुद का जमीर है भटक रहा
पर उसको भिक्षा देता है
खुद की खुद्दारी बेच दिया
गैरों की चमक में गिर करके
हमको नैतिकता सिखाता है
खुद को गैरों को सौंप करके
एक बार उतरकर हाट में जो
खुद की कीमत को लगा दिया
परवाने बन दीवानों की
चाहत को उसने जगा दिया
हर कोई गजल ढूंढेगा वहां
एक बार जहां महफिल है सजी
किसी चकोर को जहां चांद दिखे
उसकी नज़रें वहां रहें टिकी
खुद डूब गए मुझे पता है वो
खुद को तो रोक नहीं पाए
फिर किस जमीर की पेंदी से
पाठ तमीज का किसी को का पढ़ायें
-कुँवर संदीप सिंह