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हिंदी की बिंदी

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलो हिंदी के बिंदी की
        
                                                    
                            
चमक तुमको दिखाता हूं
छुपी तस्वीर प्यारी सी
खोलकर सामने लाता हूं
वह तस्वीर जिसको हर
कोई जाने वह पहचाने
ना देखा हो कभी पहले
तो भी अपना उसे माने
इस तस्वीर के रंग में
दिखे सबको ही रंग अपना
इससे मिलने में सबका ही
साकार हो सपना
यह जोड़ती काश्मीर से
कन्याकुमारी को
हर किसी में ही हिंदी
लाती है खुमारी को
जिसे अंग्रेजी कहते हैं
उसे गोरों ने लाया था
वह गोरे थे यह गोरी है
ऐसा भ्रम फैलाया था
इस भ्रम में बहक कर
हैं कुछ हो गए बहरे
अंग्रेजी के दिखावे से ही
हैं चमकाते अपने चेहरे
पर हिंदी सी वैज्ञानिक
नहीं कोई भी भाषा है
जो लिखते हैं वही बोलें
नहीं कोई तमाशा है
अपने को ही अपना मान
अपनेपन से अपनाओ
दिखावे में छोड़ अपना
गैर में फंसाते मत जाओ
नष्ट कर अपनी मर्यादा
कहीं भी हंसते मत जाओ
जो है विस्तार जीवन में
उसे और कसते मत जाओ
सीख लो कितनी भी भाषा
कुँवर हिंदी को रखो दिल में
भरो अनुभूति का आनंद
इस जीवन की महफिल में

- कुँवर संदीप सिंह
2 महीने पहले
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