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कोई मुझको समझाए अब

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            याद करूँ या शब भर रोऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।
        
                                                    
                            
राह देखूँ या फिर घर जाऊं कोई मुझको समझाए अब।।
वो तो कब का चला गया है रहता था जो दिल के अंदर,,
कैसे अब इसको समझाऊँ कोई मुझको समझाए अब।।
कितना आसाँ होता हैं यां दिल का क़त्ल दिलों के हाथ,,
दिल को छोड़ूं या मर जाऊँ कोई मुझको समझाए अब।।
जब चेहरे में छुपा हो चेहरा कितना मुश्किल है बचना,,
आईना इक घर से ले आऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।
वो तो रह गया मीलों पीछे और आगे लगता हैं शमशान,,
शाम हुई है क्या रुक जाऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।
दिल की गली में क्या जाना अब मातम सा इक रहता है,,
हवा बनूँ या गर्क़ हो जाऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।
उसको तो मालूम नहीं के क्या क्या गुज़री मुझपे देव,,
दफ़्न रहूँ या मिलने जाऊँ कोई मुझको बतलाए अब।।

- सुनील देव
2 महीने पहले
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