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कारगुज़ारी में यहां कब कौन कर पाया बसर

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या ज़रूरी है के जीने के लिए जां चाहिए।।
        
                                                    
                            
पत्थरों के बीच में कुछ फांसिलें यां चाहिए।।

हाल उनसे पूछना जो रो दिए बिन अश्क़ ही,,
वरना तो इस ज़िंदगी में हांसिलें जां चाहिए।।

दर्द की इंतहा तक अगर जाओगे तो पाओगे,,
चलने को मंज़िल तलक काबिलें पां चाहिए।।

आज के इस दौर में यां कौन समझें इश्क़ को,,
जो गुज़र गए इस गली से फिर से यां चाहिए।।

दूर से जो दिख रहा है हक़ीक़त में नहीं है वो,,
जो दिखा दे आईना वो राज़-ए-निहाँ चाहिए।।

कारगुज़ारी में यहां कब कौन कर पाया बसर,,
ख़त्म ना हो जो कभी ऐसी साहिबे जां चाहिए।।

दर्द ए बस्ती से निकल देव बस गया है तू कहां,,
मुझको भी तो ऐसी ही इक जगह यां चाहिए।।
-सुनील देव
एक महीने पहले
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