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छोड़ आए हैं।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तक़दीर में लिखा था सब छोड़ आए हैं।।
        
                                                    
                            
हम अपने बुजुर्गो का गाँव छोड़ आए हैं।।

क्या जानते थे आयेगा मौसम भी दर्द का,,
मटके सब मिट्टियों से बने तोड़ आए हैं।।

अच्छे की आरज़ू में जला दिए बुरे सभी,,
हमको क्या पता था के घर तोड़ आए हैं।।

नाराज़गी के नाम पर बस रह गई तन्हाई,,
महफ़िल तो कब की पीछे छोड़ आए हैं।।

रह रहके याद आए हैं बचपन की आदतें,,
सिक्कों में चंद अपना हुनर छोड़ आए हैं।।

तबियत ख़राब हो गई खा खाके शहर का,,
सरसों का साग रोटी जब से छोड़ आए हैं।।

अब कैसे जाए लौट कर वापस वहीं पे देव,,
मटकी के नाम पर दिलों को तोड़ आए हैं।।
-सुनील देव
3 दिन पहले
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