किताब का आख़िरी पन्ना पढ़कर
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
कहानी खत्म हो चुकी थी,
लेकिन मन में एक सवाल बाकी था—
क्या सचमुच हर कहानी का अंत होता है?
कुछ लोग कहानी से चले जाते हैं,
मगर उनके शब्द रह जाते हैं।
कुछ रिश्ते खत्म हो जाते हैं,
मगर उनकी परछाइयाँ
बहुत देर तक साथ चलती हैं।
और कुछ सपने…
वे पूरे न होकर भी
हमें बदल जाते हैं।
मैंने किताब बंद कर दी।
कमरे में खामोशी थी।
खिड़की से आती हल्की-सी रोशनी
उस बंद किताब पर ठहर गई।
तभी मेरी नज़र
आख़िरी पन्ने के बाद पड़े
एक खाली पन्ने पर गई।
मैंने उसे छुआ।
वह बिल्कुल खाली था।
न कोई नाम,
न कोई तारीख,
न कोई शब्द।
बस एक खाली पन्ना।
शायद वही
कहानी का असली अंत नहीं,
अगली शुरुआत थी।
मैंने कलम उठाई।
इस बार किसी और की कहानी नहीं लिखनी थी।
इस बार
जो कुछ बचा था,
जो कुछ टूट गया था,
और जो कुछ अभी बाकी था—
उसे लिखना था।
मैंने पहला शब्द लिखा।
और तब समझ आया—
कुछ कहानियाँ खत्म नहीं होतीं,
वे बस किताब बदल लेती हैं।