विज्ञापन

शब्द साधना "मैं नहीं रहा"

Sadhna Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐसा नहीं कि कुछ भी बाक़ी नहीं रहा, अपनों से बिछड़कर वही मैं नहीं रहा।
        
                                                    
                            
हर मोड़ पर ज़माने ने मुझको परख लिया, अब दिल में पहले जैसा कभी डर नहीं रहा।
ठोकर ने हर क़दम पे नया हौसला दिया, गिरने का अब मुझे तो कहीं डर नहीं रहा।
अपने ही हाथ से जो मुकद्दर सँवार लिया, तक़दीर पर यक़ीं के सिवा कुछ नहीं रहा।
दर्दों को ओढ़कर भी मैं हँसता चला गया, चेहरे पे अब किसी का असर ही नहीं रहा।
झुकना पड़ा तो झुक गया रिश्तों की लाज में, लेकिन मेरा ज़मीर कभी कम नहीं रहा।
तन्हाइयों ने मुझको तराशा है इस क़दर, आईने में भी आज वही मैं नहीं रहा।
पत्थर हज़ार आए मेरी राह रोकने, हिम्मत के सामने तो कोई ग़म नहीं रहा।
"विंध्य" अंधेरों को उजाला बना दिया, अँधेरों का अब दिल पे कहीं दम नहीं रहा।
ऐसा नहीं कि कुछ भी बाक़ी नहीं रहा, अपनों से बिछड़कर वही मैं नहीं रहा।
-साधना मिश्रा 'विंध्य'
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all