धड़कन में चल रहा है जो वो शोर तो नहीं है,
जाकर ज़रा ये देखो कोई और तो नहीं है।
दिल खिंच रहा है जिसकी तरफ़ बेख़ुदी में आज,
उस अजनबी की चाहत का ये छोर तो नहीं है।
बाँधा है जिसने हमको बिना कुछ कहे-सुने,
वो याद की पुरानी कोई डोर तो नहीं है।
सहमे हुए हैं पेड़ हवाओं के ख़ौफ़ से,
सावन के इस महीने में ये मोर तो नहीं है।
चलते ही जा रहे हैं ज़माने के साथ हम,
हालात पर हमारा कोई ज़ोर तो नहीं है।
टूटे हुए खिलौने सा बिखरा है जो यहाँ,
कल तक जो आदमी था ये वो तौर तो नहीं है।