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ज़माने से बेगाना यही ख़याली दुनिया सच्चा लगता है

Sabbir Kamal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दस बाई छे के इसी कमरे में
        
                                                    
                            
एक मेज़ और उसपे पड़ी कुछ काग़ज़ हैं

दीवारों पर ठहरी ख़ामोशी
और खिड़की में थकी सी धूप है

आने-जाने का वही दरवाज़ा
जिसे अब कोई खटखटाता नहीं

कभी-कभी कुछ यादें आती हैं
जैसे धूल उड़े पुराने संदूक से

दो-चार अधूरी सी नज़्में हैं
कुछ अफ़साने जो लिखे ही नहीं

कुछ चेहरे जो मे भूल गया हु
और कुछ नाम जो मिटते ही नहीं

अब यही हाल अच्छा लगता है
ज़माने से बेगाना यही ख़याली दुनिया सच्चा लगता है
3 सप्ताह पहले
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