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नामंजूर छुट्टी या वरदान

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                            शरत चंद्र चट्टोपाध्यायजी रंगून में
        
                                                    
                            
एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे ,
1916 में वे बहुत बीमार पड़ गए
बहुत सूजन आ गई थी उनके पैरो मे ।

उन्होंने कोलकाता में इलाज के लिए
एक महीने की छुट्टी मांगी,
लेकिन उनकी ड्यूटी के आखिरी
दिन उनकी छुट्टी नामंजूर कर दी गई।

शरतचंद्र जी ने इस्तीफ़ा
दे दिया नौकरी से,
वे कोलकाता आ गए,
ठीक होने के बाद उन्होंने
आज़ादी के आंदोलन में
सक्रिय रूप से हिस्सा लिया ।

उनकी किताब 'पथेर दाबी'
बहुत ही मशहूर हुई,
अंग्रेजों ने उस पर रोक लगा दी,
पर छुट्टी न मिलना एक तरह से
उनके लिए वरदान साबित हुआ,
एक आम कर्मचारी से वे
एक महान लेखक और
स्वतंत्रता सेनानी बन गए।
-सुबीर कुमार भट्टाचार्य
4 दिन पहले
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