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बारिश में मिट्टी का चूल्हा बिखर जाता है

RUPESH KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी वक्त मिले तो आकर देखो गरीब की झोपड़ी में,
        
                                                    
                            
कितने दाने पड़े हैं गरीब की टोकरी में।
रिमझिम वर्षा की बूंदे कहां सोने देती है झोपड़ी में?
जो मुँह का निवाला था वह भीग गया टोकरी में।
कभी वक्त मिले तो आकर देखो गरीब की झोपड़ी में।

बारिश में मिट्टी का चूल्हा बिखर जाता है,
देख उस आंगन का दर्द बदन सिहर जाता है।
तिनका तिनका इकट्ठा कर झोपड़ी बनाते हैं,
कभी आंधी, कभी तूफान आकर झोपड़ी ले उड़ जाते हैं।
नहीं चारपाई होती है नहीं पलंग
चादर फैला कर सो जाते हैं एक अलँग।
फिर भी झोपड़ी में हंसी गूंजती है
जैसे कि सावन में मोरनी झूमती है।
आदर और प्रेम का भावना कभी कम नहीं होता
दर्द झेल लेते हैं मगर मुस्कान कम नहीं होता।
वाह रे कुदरत तेरी ये कैसी लीला है
कहीं काला बादल कहीं आकाश नीला है।
गरीबी के संघर्ष में उम्र यूं गुजर जाती है
परिवार को आगे बढ़ाने में जिंदगी सुधर जाती है.... 
-रुपेश परदेशी
2 महीने पहले
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