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शून्य-सरगम

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंकित करूँ यदि क्षत-शृंखला, इस मौन के चित्-पृष्ठ पर,
        
                                                    
                            
क्या तुम बनोगी उपशमन, इस दग्ध व्याकुल सृष्टि पर?
बिखरे हुए हैं स्वर सभी, इस श्वास की वीणा तजे,
तुम क्या बनोगी दिव्य सरगम, जो हृदय में फिर बजे?

है भ्रांत-पथ से क्लांत मानस, रिक्त-हस्त, हतप्रभ खड़ा,
भव-व्यूह के इस हाट में, अवसाद-मूर्छित हूँ पड़ा।
मार्तंड का उत्ताप झुलसाता, प्रगाढ़ प्रपंच को,
सींचोगी क्या पीयूष बन, इस शुष्क अंतस-मंच को?

तुम दिव्य-ऊर्जस्वल कलिका, सुमुखि कंचन-काय सी,
मैं भग्न-उपवन का मलिन, ऋतु-शीर्ण केवल छाय सा।
शायक-शयन पर रैन कटती, निष्ठुरा निश-वात की,
क्या सहचरी तुम बनोगी, इस कठिन पथ-घात की?

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
2 महीने पहले
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