विज्ञापन

अंतर्दाह

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शताब्दियों का संचित मानस, आज सिसकता मौन यहाँ है,
        
                                                    
                            
विश्वासों का पावन मंदिर, ध्वस्त हुआ, अब कौन यहाँ है?
छल की इस निष्ठुर आंधी में, झुलस गई संवेदना सकल,
पहचानेगा इस अंतस की, मर्म-व्यथा को कौन यहाँ है?

वह निश्छल प्राणों का तंतु, ग्रन्थि-युक्त होकर रोता है,
जगत-बोध के तीखे शूलों को, भीतर ही वह बोता है।
पाषाण हुई इस वसुधा पर, बहती केवल शुष्क श्वास,
निष्कपट हृदय इस दंभ-जगत में, अपना सर्वस्व ही खोता है।

शून्यता के इस महा-सिंधु में, डूबा चेतना का संवित,
निष्ठुर संसृति के प्रहार से, आत्मा बैठी आज चकित।
अब करुणा भी है मौन खड़ी, इस विस्मृति के अंधियारे में,
मानवता का उजड़ा उपवन, देख हुआ यह भाग्य थकित।

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all