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प्रेम की परिभाषा

Ritu Matawale

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्रेम भरा समर्पण,हृदय को छू जाती है।
        
                                                    
                            
दिल की हर कोने में,खुसबू बिखर जाती है।
हो मन मे विश्वश,भरोसा बढ़ जाती है।
सच्ची प्रेम की दासता,अमर हो जाती है।
प्रेम का हर भाव,पुष्प सा पल्वित हो जाती है।
प्रेम कोई गुनाह नही,प्रेम हृदय से आती है।
हो प्रेम सच्चा,तो जीवन महक जाती है।
यू ही नही होता प्रेम,हर किसी इंसन से।
यू ही नही उभरता भाव,हर किसी के मन से।
प्रेम जिसे होता है, ओ हृदय में सदा रहता है।
पास नही हो कर भी,पास नजर आता है।
दूरियों में भी,सच्ची मोहोब्बत नजर आता है।
सच्चा प्रेम कभी,नही चाहता शरीर।
सच्चा प्रेम कभी नही होता,जीवन मे अधीर।
सच्चा प्रेम,आनन्द भरा सुख का सागर है।
महकती चम्पा और,चमेली का हार है।
हर खुसी होती है, हर आनन्द होता है।
सच्चा प्रेम,बड़ी ही अनमोल होती है।
जिसे मिल जाये सच्चा प्रेम,उसकी जीवन अनमोल होती है।
दुख में भी सुख जैसा,उसकी संसार होती है।
मानो जैसे जीवन,प्रेम भरी मोती है।
प्रेम एक अनभूति है, आनन्द और उल्लास है।
जिसे हो जाये सच्चा प्रेम,वही जीवन मे सुखी है।
प्रेम का मतलब,किसी को पा लेना नही।
प्रेम का मतलब ,किसी के पास होना नही।
सच्चा प्रेम तो,एक अतभूत आनन्द है।
दो आत्माओ का,एक अनोखा सम्बन्ध है।
दो दिलो का एक,अनोखा धड़कन है।
दो विचारो का,एक समन्मय है।
दो विचार एक हो जाय,सायद वही सच्चा प्रेम है।
प्रेम अर्पण है, समर्पण है खुसी और उल्लास है।
मन की पीड़ा की,सुखी भरी दवा है।
दर्द भरी सिहरन में भी,सुकून भरी दवा है।
सच्चा प्रेम आत्मा से हो कर परमात्मा तक जाती है।
ना शरीर की चाहत, ना आकर्षण का जोर है।
सच्चा प्रेम हृदय को ,जोड़ने वाली एक डोर है।
प्रेम की परिभाषा,बड़ी ही अनमोल है।
3 महीने पहले
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