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खुली किताब

Rinkee goswami

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम खुली किताब हो गए,
        
                                                    
                            
दर्द बेहिसाब हो गए।
जिंदगी में राग न तो रागिनी
शौक में तबाह हो गए।

मुश्किलों का दौर भी नया,
जिसकी चाह थी वो गया।
दोष दूं किस्मत या रब को,
जो लिखा वो हो गया।

मांगने से कब कहां कुछ मिला,
करें किससे शिकायत किससे गिला।
जो होना है हो जायेगा वक्त पर
सिर को पटके हाथ जोड़ें किससे भला।

मुश्किलों का दौर है,
अब कहीं न ठौर है।
है सफर कठिन बहुत
हर तरफ ये शोर है।
2 महीने पहले
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