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युवाओं की बातों का मर्म

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            संबंधों की दीवार तोड़ दी,
        
                                                    
                            
अब ज़रा ज़माने के रहनुमाओं से जाकर पूछना,
क्या अब भी कुछ बाकी है,
या हर रिश्ते पर पहरा लगाना बाकी है?
दो पढ़े-लिखे, समझदार युवाओं के मन की बात,
समझना ही नहीं चाहते हैं,
फिर कहते हैं… “ये बच्चे नादान हैं,”
अरे साहब, नादान तो वो हैं,
जो समझकर भी समझना नहीं चाहते हैं।
हमने उम्र की दहलीज़ पार की है,
अपनी सोच भी तैयार की है,
फिर क्यों हमारी पसंद को,
हर बार कठघरे में खड़ा किया जाता है,
क्यों दो दिलों की बात को,
खानदानों की इज़्ज़त से तौला जाता है?
चाँदी की दीवार थी तोड़ दी थी कभी,
लोहे की जंजीर भी तोड़ देंगे,
अगर प्यार को अपराध कहोगे,
तो सवाल भी खुलेआम छोड़ देंगे।
तुमने रस्मों की किताबें पढ़ीं,
हमने भी रिश्तों की धड़कन पढ़ी है,
तुम्हें डर है दुनिया क्या कहेगी,
हमें यक़ीन है…
दुनिया कल यही कहानी पढ़ेगी।
रहनुमाओं से जाकर कहना,
फैसले सिर्फ़ उम्र से नहीं होते,
दो समझदार दिल अगर साथ खड़े हों,
तो रिश्ते सिर्फ़ घरों से नहीं होते।

हमने किसी से कुछ छीना नहीं,
बस अपना हक़ माँगा है,
एक-दूसरे को समझकर चुना है,
कोई गुनाह नहीं किया…
बस अपने जीवन का रास्ता चुना है।
अब भी अगर कुछ बाकी है,
तो दीवारें नहीं, संवाद बाकी है,
हुक्म नहीं, विश्वास बाकी है,
और अगर दो युवाओं की बात समझनी ही नहीं है,
तो फिर बताओ रहनुमाओं…
ये कैसी आज़ादी है,
जहाँ पढ़ने-लिखने की इजाज़त तो है,
मगर अपनी ज़िंदगी चुनने की इजाज़त बाकी नहीं है?
ये कैसा इंतखाब है, इसमें तबदीली कैसे लायें,
क्या विश्वास और बढ़ाना पड़ेगा,
संवाद और बढ़ाना पड़ेगा,
ठोस कारण और स्पष्टीकरण और बढ़ाना पड़ेगा |
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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