एक दिन मैं,
तीन चौराहों से गुज़रा।
पहले चौराहे पर,
लोग एक आदमी का नाम लेकर,
घंटों उसकी कमियाँ गिना रहे थे।
कौन कैसा है,
किसने क्या पहना,
किसने किससे क्या कहा…
बातें बहुत थीं,
मगर उनमें कोई रास्ता नहीं था।
मैं आगे बढ़ गया।
दूसरे चौराहे पर,
भीड़ किसी हादसे की कहानी सुना रही थी।
हर किसी के पास,
एक नया विवरण था,
एक नया अनुमान,
एक नई अफ़वाह।
बातें वहाँ भी थीं,
लेकिन वे कल तक पुरानी हो जाने वाली थीं।
मैं फिर आगे बढ़ गया।
तीसरे चौराहे पर,
सिर्फ़ दो लोग बैठे थे।
न कोई शोर,
न कोई तमाशा।
एक ने पूछा…
"अगर इंसान अपने डर से बाहर निकल आए,
तो उसकी ज़िंदगी कितनी बदल सकती है?"
दूसरे ने जवाब नहीं दिया।
उसने ज़मीन पर,
एक छोटा-सा बीज रख दिया।
मैंने हैरानी से पूछा,
"ये जवाब है?"
वो मुस्कुराया।
बोला…
"घटनाएँ पेड़ों की छाया जैसी होती हैं,
लोग उन छायाओं पर बहस करते रहते हैं।
लेकिन विचार...
वो बीज होते हैं।
अगर उन्हें समझ लिया जाए,
तो एक दिन वही जंगल बन जाते हैं।"
उस दिन मुझे समझ आया,
बात करने का विषय ही,
मन की दिशा बता देता है।
जिसे हर वक़्त,
दूसरों की ज़िंदगी में झाँकने की फुर्सत है,
शायद उसने अभी तक,
अपनी ज़िंदगी की खिड़की खोली ही नहीं।
और जो हर घटना से,
एक नया विचार जन्म देता है,
वक़्त उसी के शब्दों को,
अनुभव की मिट्टी में बो देता है।
क्योंकि नामों की चर्चा,
कुछ देर तक चलती है,
घटनाओं की चर्चा,
कुछ दिनों तक चलती है,
लेकिन विचार...
वे पीढ़ियों तक,
बिना अपना नाम बताए भी,
लोगों के जीवन में रोशनी करते रहते हैं।
इसीलिए कहते हैं :
मजबूत दिमाग विचारों पर चर्चा करता है,
औसत दिमाग घटनाओं पर चर्चा करता है,
कमजोर दिमाग व्यक्ति पर चर्चा करता है|
-रतन कुमार कैथवास