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ठंड क्यों नहीं लगती

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कैलाश की बर्फ़ पूछती है… शिव को ठंड क्यों नहीं लगती,
        
                                                    
                            
जिसके भीतर अग्नि हो अनंत, उसे ऋतुओं का असर कहाँ पड़ता है।

वो महायोगी हैं, समाधि में पंचतत्वों से पार हैं,
देह रहे या देह से ऊपर… उनकी चेतना ही संसार है।

भस्म लिपटी देह कहती है, भय कैसा इस हिमपात से,
बाघंबर ओढ़े बैठे हैं, निर्भय अपने विराट स्वरूप के साथ से।

जहाँ श्वास भी साधना हो और मौन स्वयं मंत्र बन जाए,
वहाँ हिमालय की सर्द हवा भी भला किसे कंपकंपाए।

पार्वती केवल संगिनी नहीं, स्वयं शक्ति का विस्तार हैं,
शिव में ऊर्जा, शक्ति में शिव… दोनों एक ही आधार हैं।

जहाँ शक्ति स्वयं विराजे, वहाँ ठंड कैसी, ताप कैसा,
जिसमें ब्रह्मांड समाया हो, उसके लिए आकाश कैसा।

कैलाश महज़ पर्वत नहीं, देवत्व का धाम कहा जाता है,
जहाँ मनुष्य का भौतिक नियम नहीं, आध्यात्मिक विधान चलता है।

बर्फ़ जमती रहे शिखरों पर, हवाएँ चलती रहें अपार,
शिव-पार्वती के लिए कैलाश है स्वयं चेतना का संसार।

हम ठिठुरते हैं मौसम से, वो मौसम के भी पार खड़े हैं,
हम प्रकृति के नियमों में हैं, वो प्रकृति के आधार खड़े हैं।

इसीलिए कैलाश की चोटी पर हिम चाहे जितना बरसे,
शिव की समाधि में अग्नि जले… तो ठंड किस तरह असर करे।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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