शीशे-सी बेदाग उसकी मुस्कान थी,
मन का मंत्रालय मुग्ध हो जाता था...
पहली बार जब उसे देखा,
तो लगा जैसे सुबह ने,
अपनी पहली किरण उसके चेहरे पर रख दी हो।
ना कोई बनावट,
ना कोई दिखावा।
बस एक मुस्कान...
इतनी साफ़ कि,
आईना भी उसे देखकर,
अपनी चमक पर शक करने लगे।
मैंने धीरे से पूछा…
"इतना मुस्कुरा कैसे लेती हो?"
वो बोली…
"जो दिल में मैल नहीं रखते,
उन्हें होंठों को एक्स्ट्रा मेहनत नहीं करनी पड़ती।"
उसके इतना कहते ही,
मेरे भीतर अजीब-सी हलचल हुई।
मन का पूरा मंत्रालय,
एकाएक बैठक में बैठ गया।
दिल ने प्रस्ताव रखा…
"इसे देखते रहो..."
दिमाग़ ने फ़ाइल पलटते हुए कहा…
"ज़रा संभलकर,
इतनी रोशनी में लोग अक्सर
अपनी आँखें खो बैठते हैं।"
मगर मन...
मन तो जैसे विपक्ष छोड़कर,
उसकी मुस्कान के पक्ष में,
सर्वसम्मति से खड़ा हो गया।
उस दिन हम बाज़ार से नहीं,
पेड़ों की छाँव वाली पगडंडी से लौटे।
वो रास्ते भर,
हर छोटी-सी बात पर हँसती रही।
कभी उड़ती तितली पर,
कभी बारिश से धुले पत्तों पर,
कभी मेरी बेवक़ूफ़ियों पर।
मैंने कहा…
"तुम्हारी हँसी का कोई कारण भी होता है?"
वो बोली…
"हर मुस्कान वजह से नहीं आती,
कुछ मुस्कानें,
सिर्फ़ किसी अपने की मौजूदगी से खिल जाती हैं।"
मैं चुप हो गया।
उस पल समझ आया...
सौंदर्य चेहरे का नहीं,
सहजता का होता है।
और कुछ लोग,
अपने चेहरे से नहीं,
अपनी मुस्कान से याद रह जाते हैं।
विदा लेते समय,
उसने बस एक बार पलटकर देखा।
वही शीशे-सी बेदाग मुस्कान...
मैं देर तक उसे जाता देखता रहा।
तब महसूस हुआ…
उसकी मुस्कान में कोई जादू नहीं था,
जादू तो उस सादगी का था,
जिसने मेरे भीतर बैठे,
हर संशय को इस्तीफ़ा दे दिया।
और मन का मंत्रालय,
जो बरसों से उलझी फ़ाइलों में दबा था,
उस एक मुस्कान के सामने,
बिना किसी बहस के,
इबादत के पक्ष में अपना निर्णय सुना चुका था।
-रतन कुमार कैथवास