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पूरी ग़ज़ल कह दी

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लब सिल गए, मगर निगाहों ने हर हलचल कह दी,
        
                                                    
                            
बिन बोले ही इश्क़ की सारी मंज़िल कह दी।

पलकों ने जब झुककर अदब से सलाम किया,
दिल ने उसी घड़ी अपनी पूरी महफ़िल कह दी।

चेहरे पर कोई शिकन, कोई इज़हार भी न था,
एक मुस्कान ने मगर सदियों की मुश्किल कह दी।

साँसों की आहट ने दस्तक भी नहीं दी थी,
धड़कनों ने फिर भी हर एक मंज़िल कह दी।

चाँद भी ठहरकर देर तलक हमको देखता रहा,
रात ने सितारों से हमारी महफ़िल कह दी।

होंठों ने तो ख़ुद को ख़ामोशी में क़ैद रखा,
आँखों ने मगर मोहब्बत की हर तफ़सील कह दी।

जिसे उम्र भर किताबों में ढूँढ़ते रहे लोग,
एक नज़र ने पल भर में वही हासिल कह दी।

अब किसे गवाह बनाते इस बेआवाज़ इश्क़ का,
जब आँखों ने बिना लफ़्ज़ों के पूरी ग़ज़ल कह दी।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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