विज्ञापन

नूर कुछ कम क्यों है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आँखों में जो बुलबुले उठ रहे हैं, लगता है साबुन कुछ कम है,
        
                                                    
                            
हवाएँ भी आज उदास-सी गुमसुम हैं, शायद उनमें रवानी कुछ कम है।

बादल तो हैं आसमान में, मगर बरसने की कहानी कुछ कम है,
दिल में हलचल बहुत है लेकिन लबों पर बयान कुछ कम है।

रास्ते वही हैं, मंज़िल वही, मगर कदमों में रवानी कुछ कम है,
शहर तो रोशन बहुत है लेकिन उसके चेहरे पर नूर कुछ कम क्यों है।

हमने तो चाहा था समंदर-सा उमड़ना हर एक अरमान में,
मगर आज इन लहरों में भी जैसे कोई तूफ़ानी कुछ कम है।

कभी हवा को भी चाहिए कोई खुला आसमान मिलने को,
शायद इसीलिए आज उसकी उड़ान में बेबाकी कुछ कम है।
-रतन कुमार कैथवास
1 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

विजय कुमार

177 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13122 कविताएं

View Profile