दूर तक फैली है शबनम जाड़े की भोर में,
अब मुसाफ़िर क्या करे।
हर तरफ़ धुंध ने लिख दीं अनजानी मंज़िलें,
अब मुसाफ़िर क्या करे।
काँपती पगडंडियाँ भी पूछती हैं नाम उसका,
राह के पत्थर हुए हैं आज फिर हमदम उसका,
पाँव में चुभते हैं मौसम, आँख में ठहरा सफ़र,
अब मुसाफ़िर क्या करे।
धूप ने आने का वादा शाम तक टाला बहुत,
आस का चिराग़ लेकिन आँधियों में जला बहुत,
हाथ खाली, दिल में यादों का भरा है कारवाँ,
अब मुसाफ़िर क्या करे।
एक चिड़िया डाल पर बैठी दुआएँ गुनगुना रही,
सूखी टहनी भी उसे चुपके से हिम्मत दे रही,
ज़िंदगी कहती है चलना ही इबादत बन गया,
अब मुसाफ़िर क्या करे।
झोपड़ी के धुएँ ने आसमाँ को छू लिया,
रोटियों की सोंधी महक ने फिर घर का रस्ता चुन लिया,
पर जिसे घर ही नसीबों ने कभी सौंपा नहीं,
अब मुसाफ़िर क्या करे।
रात ने तकिए तले कितने सितारे रख दिए,
नींद ने लेकिन सभी सपनों के दर बंद कर दिए,
दिल की वीरान बस्तियों में गूँजता है उसी का स्वर,
अब मुसाफ़िर क्या करे।
वक्त की इस रेल में सब अपने-अपने मोड़ पर,
कोई हँसकर उतर गया, कोई ठहरा छोड़कर,
जिसको अपनी ही तलाशों ने बनाया रहगुज़र,
अब मुसाफ़िर क्या करे।
आख़िरी उम्मीद भी जब ओस बनकर ढल गई,
साँस की हर एक माला चुप दुआ में बदल गई,
रब अगर मंज़िल नहीं, हिम्मत ही दे दे उम्र भर,
तब मुसाफ़िर चल पड़े,
और भला अब क्या करे।
-रतन कुमार कैथवास