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मंदिर की सीढ़ियों पर शाम बिताया कर

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुंदन सा रूप है तेरा, फिर भी अंदर इतना ज़हर,
        
                                                    
                            
चेहरे पर उजला उजाला, बातों में क्यों इतना कहर।

कुछ तो अपनी भाषा सुधारो, शब्दों में मिठास लाया करो,
हर बात में तकरार नहीं, कभी प्यार भी जताया करो।
मन में इतनी आग लिए, कब तक खुद को जलाओगे,
थोड़ा खुद से बात करो, थोड़ा खुद को समझाओ।

कुछ दिन किसी मंदिर की सीढ़ियों पर शाम बिताया करो,
एक छोटा-सा दिया जलाकर, मन का अँधेरा मिटाया करो।
घंटियों की आवाज़ सुनो, कुछ देर वहीं ठहर जाया करो,
भागती हुई जिंदगी में, खुद से भी मिल आया करो।

थोड़ा ध्यान, थोड़ा योगा, सुबह की हवा में चला करो,
लेकिन भजन-कीर्तन में भी कभी बैठकर गाया करो।
सुर चाहे सही न हों, मन से दो स्वर लगाया करो,
ईश्वर के दरबार में जाकर, अपना बोझ उतारा करो।

धीरे-धीरे मन की कड़वाहट कम होने लगेगी,
बातों में छुपी तल्खी भी नरम होने लगेगी।
जो बेचैनी आज सीने में रात-दिन शोर मचाती है,
वही शांति बनकर एक दिन चेहरे पर मुस्कुराती है।

नकारात्मकता को रोज़ थोड़ा-थोड़ा दूर भगाया करो,
अपने भीतर के अच्छे इंसान को फिर से बुलाया करो।
हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता,
कुछ बातों को मुस्कुराकर भी टाल दिया करो।

फिर देखना रातें भी कुछ सुकून से गुजरेंगी,
आँखों पर नींद की मीठी चादरें उतरेंगी।
मन हल्का होगा, साँसों में ठहराव आएगा,
और तुम्हारा अपना ही चेहरा तुम्हें अच्छा लगने लगेगा।

कुंदन सा रूप है तेरा, इसे कड़वाहट से मत भर,
दुनिया को जीतने से पहले, जीत ले अपना ही अंदर।
दीया मंदिर में जलाना ही पूजा का पूरा सार नहीं,
अपने शब्दों में उजाला रखो… इससे बड़ी कोई बात नहीं।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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