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जवाब की ईमानदारी

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            टरकाने वाली बातें उसे कतई पसंद नहीं थीं।
        
                                                    
                            
उसे हर सवाल का स्पष्ट कारण चाहिए होता था।
मैंने मुस्कुराकर कहा…
"इतनी सुंदर सूरत पर गुस्सा ही अच्छा लगता है..."
बस इतना सुनना था कि
उसने आँखें और तरेर दीं।
बोली…
"फिर वही…
मैंने कारण पूछा है,
तारीफ़ नहीं।"

मैंने कुर्सी पीछे सरकाई,
खिड़की से आती धूप को देखा,
और मन ही मन सोचा…
कुछ लोग जवाब नहीं,
जवाब के पीछे का सच सुनना चाहते हैं।
मैंने कहा…
"तुम्हें पता है,
पहाड़ों में जब बादल रास्ता रोक लेते हैं,
तो लोग इंतज़ार करते हैं,
क्योंकि उन्हें मालूम होता है
कि धूप बहाना नहीं बनाएगी,
ज़रूर निकलेगी।"
वो बीच में ही बोल पड़ी…
"उदाहरण मत दो,
सीधे मुद्दे पर आओ।"

मैं हँस पड़ा।
"यही तो तुम्हारी सबसे प्यारी आदत है।
तुम्हें गोल-गोल घूमती बातें नहीं,
सीधे दिल तक पहुँचती बातें पसंद हैं।"
वो चुप रही।
मतलब अब भी नाराज़ थी।
मैंने धीरे से कहा…
"सच ये है कि,
सुबह मैं तुम्हारी बात सुन तो रहा था,
पर समझ नहीं रहा था।
और जब इंसान समझे बिना जवाब देता है,
तो सामने वाले को टरकाना ही लगता है।"
उसकी आँखों का गुस्सा,
थोड़ा-सा पिघला।

बोली…
"तो पहले ही ये कह देते।"
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया…
"क्योंकि आदमी अक्सर
अपनी गलती स्वीकार करने से पहले,
सौ बहाने ढूँढ़ लेता है।"
हवा का एक झोंका आया।
उसके बाल चेहरे पर आ गए।
उसने उन्हें कानों के पीछे किया।

मैंने फिर शरारत से कहा…
"लेकिन एक बात अब भी नहीं बदलूँगा।"
वो बोली…
"क्या?"
मैंने कहा…
"इतनी सुंदर सूरत पर,
गुस्सा सचमुच अच्छा लगता है...
बस शर्त ये है कि,
गुस्सा ज़्यादा देर न ठहरे,
वरना मुस्कान को शिकायत होने लगती है।"

इस बार उसने पहली बार,
हल्की-सी मुस्कान दी।
फिर बोली…
"अच्छा...
तो अब असली कारण भी बता दिया,
और मक्खन भी लगा दिया?"
मैंने हँसते हुए कहा…
"नहीं...
रिश्तों में मक्खन नहीं लगाया जाता,
सच बोला जाता है।

हाँ, सच अगर मुस्कुराकर कहा जाए,
तो उसका स्वाद थोड़ा मीठा ज़रूर हो जाता है।
क्योंकि कुछ लोग जवाब से नहीं मानते,
उन्हें जवाब की ईमानदारी मनाती है।
और तुम उन्हीं लोगों में से हो…
जो शब्द नहीं,
शब्दों के पीछे खड़े इंसान को परखते हो।"
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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