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इलाज भी चाहते हो

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये जो तेरा अल्हड़पन है,
        
                                                    
                            
क्यों मुझे इतना ज़ख़्म दे रहा है।
मैं सोऊँ या बेचैन जागता ही रहूँ,
कुछ तो दवा बता।

उसने मुस्कुराकर मेरी तरफ़ देखा,
जैसे उसे मेरी बेबसी का इल्म हो।
बोली… "प्यार की तकलीफ़ पूछते हो,
या उसका इलाज़ भी चाहते हो?"
मैंने कहा… "दोनों..."

उसने कहा…
चलो टहलते टहलते डिस्कस करतें हैं,
वो बाग़ की पगडंडी पर धीरे-धीरे चलने लगी,
साथ में मैं भी…
पेड़ों से झरते पत्ते,
हमारे बीच ख़ामोश गवाह बनते गए।


कुछ दूर जाकर उसने,
एक मुरझाए हुए फूल को उठाया और बोली,
"देखो...
ये फूल शाख़ से बिछड़कर भी,
खुशबू देना नहीं भूला।
मोहब्बत भी ऐसी ही होती है,
दर्द देती है,
मगर अपने किरदार से मुकरती नहीं।"

मैंने कहा… "मगर ये बेचैनी?"
वो हँस पड़ी…
"जिसे हर वक़्त सुकून चाहिए,
उसे दिल नहीं लगाना चाहिए,
केवल आराम करना चाहिए।"

इतने में शाम उतर आई,
परिंदे अपने घोंसलों की तरफ़ लौट चले।
हम दोनों उसी पुरानी पुलिया पर खड़े रहे,
जहाँ नदी बिना शिकायत के,
पत्थरों को चूमते हुए बहती थी।

वो बोली…
"दवा पूछते हो न?
तो सुनो...
मुझे पाने की नहीं,
मुझे समझने की कोशिश करो।
मोहब्बत जब उम्मीद से निकलकर,
दुआ बन जाती है,
तब ज़ख़्म भी रोशनी देने लगते हैं।"

मैंने उसकी ओर देखा,
अब उसके अल्हड़पन में शरारत कम,
मासूमियत ज़्यादा दिखाई दे रही थी।
उस रात पहली बार,
मैंने बेचैनी से लड़ना छोड़ दिया।

समझ आया…
कुछ दर्द मिटाने के लिए नहीं आते,
बल्कि इंसान के दिल को, इतना बड़ा कर जाते हैं,
कि उसमें शिकायत नहीं,
सिर्फ़ मोहब्बत बची रह जाए।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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