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क़ातिल भी हो, मासूम भी लगते हो ज़माने में,

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नज़रें भी झुकीं, चेहरे पे मासूमियत भी है,
        
                                                    
                            
फिर दिल पे, ये कैसी तुम चोट करते हो।

हाथों में नहीं कुछ भी, मगर हाल ये है कि,
जिससे भी मिलो, उसका दिल निकाल लेते हो।

इल्ज़ाम भी दें तुमको, तो किस बात का दें हम,
हर ज़ख़्म को तुम, हँसके इबादत सा अंजाम करते हो।

हम सोचते रहते हैं कि, ये कैसा हुनर है,
तुम दूर रहो फिर भी, क़यामत सा करते हो।

क़ातिल भी हो, मासूम भी लगते हो ज़माने में,
ये कैसा फ़न है, कि मोहब्बत भी उससे करते हो।

और जख्म भी, जिगर पे करते हो,
तुम्हारे इसी फन की तो, वो कद्र करता है|
-रतन कुमार कैथवास
1 सप्ताह पहले
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