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दरिया की लहर बन जाऊँ

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समझौता क्यों कर लूँ खुद से, क्या दरिया की लहर बन जाऊँ,
        
                                                    
                            
तुम्हारी चाहत में बहकर क्या अपनी पहचान भूल जाऊँ?
क्या चेहरा चमकाना चाहते हो, तो इतना साफ़ कह दो,
मैं आईना नहीं जो हर बार तुम्हारे हिसाब से सज जाऊँ।

मेरी खुरदरी तसदीक ही मेरी सच्ची कहानी है,
क्यों झूठी चमक ओढ़कर किसी और का रूप बन जाऊँ?
जो दाग़ हैं चेहरे पर, उन्हें वक़्त की निशानी रहने दो,
किसी कृत्रिम उजाले में क्यों अपनी रातें गँवा जाऊँ?

तुम्हें पसंद है चमक, तो सितारों के पास चले जाना,
मैं मिट्टी हूँ… मिट्टी रहकर भी सोंधी खुशबू बन जाऊँ।
तुम कहते हो बदल जाओ, ज़रा दुनिया जैसे हो जाओ,
मैं क्यों अपने ही उसूलों से बेवफ़ाई कर जाऊँ?

चेहरा चमकाने से क्या दिल भी उजला हो जाएगा,
अगर भीतर अँधेरा हो तो किस बात पर इतराऊँ?
समझौता कर भी लूँ अगर दुनिया की खातिर,
तो फिर खुद की नज़रों में आखिर कैसे मुस्कुराऊँ?
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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